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17 अक्तूबर 2017

संगीत सोम साहिब ,,तुम खुद जो हो ,, वोह गाली तुम्हे ,,क्या दे ,,देखो ,,तुम्हारी अपनी पार्टी ने तुमसे किनारा कर लिया है ,सच यह है के तुम्हारी पार्टी ,,ताजमहल की कमाई से मज़े तो कर रही है ,,तुम्हे भी अपनी पार्टी में रखना चाहती है ,,लेकिन पार्टी में रखकर तुम्हे अहसास दिलाना चाहती है ,के तुम झूंठे हो ,बकवासी ,हो ,कुछ भी बकवास करते रहते हो ,इसीलिए तो पार्टी ने ताजमहल पर तुम्हारी बेवकूफी भरे बयान पर पीठ नहीं थपथपाई ,,उलटे ,,तुम्हारी इस बकवास से खुद ,,एन्सिएंट मोन्यूमेंट एक्ट ,,भारतीय संविधान ,,,भारतीय क़ानून के प्रावधान को ध्यान में रखकर तुम्हे दुलत्ती मार दी ,,छोडो संगीत सोम साहिब ,तुम्हारे में न तो संगीत के सुर है न मौसिक़ी न रिदम है ,,रवि के बाद के सोम तो तुम हो ही नहीं सकते ,,जब तुम्हारी पार्टी ही तुम्हारे साथ नहीं ,,तो इससे शर्मिंदगी की बात और क्या हो सकती है ,तुम्हारे में शर्म तो शायद होगी भी नहीं क्योंकि अगर तुम्हारे में शर्म होती तो पार्टी के तुम मुखोटे होने पर भी पार्टी ने जो तुम्हारे विचारो से अलग हठ कर तुम्हारा अपमान किया है ,,इसके बाद थोड़ा भी कोई ज़मीर वाला होता ,,तो पार्टी तो छोड़ ही ,,देता पार्टी के ज़मीर की ,अनुशासन की तो क्या कहूं ,,पार्टी में कुछ निजी नहीं होता ,,यह सब जानते है ,,ऐसे में पार्टी ने तुम्हे निकाला भी नहीं तो फिर हुए तो एक ही थैली के चट्टे बट्टे न ,,आपकी विचारधारा ज़रा देश के उन गद्दारो के लिए बयान कर दे ,जिन्होंने अंग्रेज़ो की मुखबिरी कर देश को गुलाम बनाये रखने की साज़िश में हिस्सा लिया था ,,ज़रा एक महिला शादी शुदा महिला ,को तलाक़ शुदा महिला से भी बदतर ज़िंदगी देने वाले के लिए भी कुछ टिपण्णी कर दीजिये ,चलो वर्तमान में भ्र्ष्टाचार के आरोपों की जांच से बचने के लिए ही कोई टिपण्णी कर दीजिये ,,अख्तर

तुम्हारे डर से नजीब लापता है ,,तुमने नजीब को गुमा दिया

तुम्हारे डर से नजीब लापता है ,,तुमने नजीब को गुमा दिया ,,पुलिस में रिपोर्ट लिखी ,,जांच सी बी आई से करवाने की नौटंकी की ,,लेकिन जांच के नाम पर जो दिखावा हुआ ,उसकी पोल ,दिल्ली हाईकोर्ट ने एक याचिका में सी बी आई और केंद्र सरकार के खिलाफ अपनी टिपण्णी देकर खोल दी है ,,,यह नजीब भारतीय था ,,इस नजीब की ज़िम्मेदारी भारत सरकार की है ,,नजीब कहाँ गया ,,किसने गायब किया ,,ज़िंदा है या मुर्दा ,,मारा तो किसने मारा ,,क्यों मारा ,,किस विचारधारा ने मारा ,,यह सवाल अनुत्तरित है ,,क्यौं है ,क्या सरकार को पता है ,,क्या सरकार ने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई ,,नहीं दिखाई तो क्यों नहीं दिखाई ,,एक गांय पशु पर हिंसा के खिलाफ तिलमिला जाने वाले लोग ,,एक नजीब जो इंसान है ,एक बेबस लाचार माँ का बेटा है ,,उस की खोज पर ,,उसके खिलाफ अत्याचार पर ,एक अल्फ़ाज़ लिखना ,,बोलना नहीं चाहते ,,उनकी विचारधारा , उनकी सोच पर उनके राष्ट्र धर्म ,उनके राजधर्म पर आज सभी शर्मिंदा है ,,खेर एक माँ अपने बेटे की तलाश में भटकती है ,इंसाफ के लिए आन्दोलन करती है ,पुलिस से इन्साफ की भीख मांगती है ,एक वरिष्ठ नागरिक ,,एक सम्मानित नागरिक ,,एक महिला ,,एक अबला के साथ देखिये ,,स्मृति ईरानी साहिबा ,,देखिये सुष्मा स्वराज साहिबा ,,देखिये महिलाओ को माताओं ,,बहनो कहकर टिपण्णी करने वाले आदरणीय प्रधानमंत्री महोदय ,,देखिये राष्ट्रपति महोदय ,,देखिये ,,क्या यह बेबस ,,लाचार माँ के साथ ऐसा सुलूक होना चाहिए ,,क्या इस मामले में सरकार उसकी पुलिस ने खोजबीन को लेकर क्या क़दम उठाये ,,जनता के सामने नहीं आना चाहिए ,,या फिर किसी कहानी के लेखक का इन्तिज़ार है जो वक़्त ब वक़्त प्रकाशित अपनी मन मर्ज़ी के मुताबिक़ प्रकाशित की जा ,सकेगी ,,जनाब संवेदनाये जगाओ ,,थोड़ा इंसान बन जाओ ,,थोड़ा सच के साथ खड़े रहने के साहसी बनो ,,अगल बगल मत देखो ,,गुमराह मत करो ,,खुद गुमराह मत हो जाओ ,,बस इंसानियत देखो ,,नजीब और उसकी माँ के साथ नाइंसाफी देखो ,,उसका धर्म ,,उसकी ज़ात मत देखो ,,प्लीज़ एक पल एक क्षण के लिए खुद को इंसान कर लो ,,वरना जो तुम हो ,,जो तुम्हारा दिमाग है वैसा तो तुम लिखोगे ही सही ,क्योंकि राज भी ,तुम्हारा ,,डंडा भी तुम्हारा ,अख़बार भी तुम्हारा ,,टी वी भी तुम्हारा ,,संसद भी तुम्हारी ,,क़लम भी तुम्हारी ,,तुम्हे रोकने का साहस खुदा के सिवा किसी में नहीं ,,लेकिन बस याद रखना उसकी लाठी में आवाज़ नहीं होती ,,आज जो खंडहर बढे बढे महलो के तुम देखते हो वोह भी कभी ऐसे ही इतराते थे ,उनका नामलेवा भी आज कोई नहीं है ,भाई ,,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

दीपावली की सभी देशवासियों को बधाई ,,मुबारकबाद ,,,लेकिन अफ़सोस इस बात का है ,,के त्योहारों के हर जश्न को अब हम ,विवादों के साथ मनाने के कुत्सित प्रयासों में जुट गए है

धनतेरस ,,रूपचौदस ,,दीपावली की सभी देशवासियों को बधाई ,,मुबारकबाद ,,,लेकिन अफ़सोस इस बात का है ,,के त्योहारों के हर जश्न को अब हम ,विवादों के साथ मनाने के कुत्सित प्रयासों में जुट गए है ,,हर त्यौहार ,,हर आस्था ,,हर मान्यता ,,कुछ लोगो द्वारा इस श में बेवजह ,,विवादित बनाकर ,,उल जलूल टिप्पणियां की जा रही है ,,दीपावली हो तो ,,जश्न मत बनाओ ,,फटाखे मत चलाओ ,,फटाखे चलाओ तो बेचने पर बिक्री ,,बात अब तो देश के सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंच गयी ,,देश के त्योहारों ,,आस्थाओ को अब कोर्ट तय करेंगी ,यह सोच कर ,,देश और देशवासियों का अस्तित्व खतरे में लगने लगता है ,,किसी त्यौहार पर जश्न मनाना ,,फटाखे फोड़ना अब ग़ैरक़ानूनी बना दिया जाए तो अफ़सोस होना वाजिब है ,,लेकिन ऐसा आदेश अगर गलत पैरवी ,,कमज़ोर क़ानूनी पैरवी के कारण हो तो ,,और अधिक अफ़सोस होता है ,वैसे अदालतों के हज़ारो हज़ार आदेश आज भी पालना के इन्तिज़ार में है ,लेकिन ऐसे आदेशों पर अब मीडिया बहस नहीं करता ,एक्सपर्ट को नहीं बिठाता ,,सरकार से जुड़े वकील धार्मिक आज़ादी ,,के प्रश्न पर बहस नहीं करते ,,आंकड़ों को नहीं बताते ,,पटाखे ,दीपावली में नहीं फूटेंगे तो कब फूटेंगे ,,वोह बात अलग है के सावधानी बरती जाए ,,कोई गाइड लाइन जारी की जाए ,,अगर कोई नेता कोई पार्टी चुनाव जीतती है ,,क्रिकेट जीतते है ,,शादी ब्याह होते है तो न जाने कितने फटाखे ,, बम,,फोड़े जाते है ,,लेकिन प्रदूषण के लिए सिर्फ पटाखों को इलज़ाम देकर उन्हें रोकना धार्मिक आस्थाओ पर चोट है ,,देश की अदालत के समक्ष काश हमारी सरकार के नियुक्त सरकारी वकीलों ने बहतरीन पैरवी की होती ,,,पुनर्निरीक्षण याचिका लगाई होती ,,वैधानिक नियम बनाये होते ,,त्योहारों का रंग जमाने की अधिसूचना जारी कर ऐसे आदेश की क्रियान्विति पर रोक लगाई होती ,,अधिवक्ता परिषद जो सरकार की विचारधारा के वरिष्ट वकीलों की संस्था है ,,कई वकील केंद्रीय मंत्री है ,उन्होंने इस व्यवस्था को जनहित ,,जनता की भावना के अनुरूप हेंडल किया होता तो जनता के अरमानो पर ,,दीपावली की खुशियों पर यूँ छुरी न चलती ,,त्योहारों को सियासत ,,अदालतों के दांव पेंचो से दूर रखना चाहिए ,,जो लोग पटाखों से प्रदूषण की बात करते है उनके बच्चो की शादियों में पटाखे फोड़ते देखने पर अफ़सोस होता है ,,होली आये तो रंग से मत खेलो ,,पानी मत बहाओ ,,,मकर सक्रांति आये तो पतंग मत उढाओ ,,खेर चायनीज़ मांझे की बात तो समझ में आती है ,,दुर्घटनाओं से बचने के लिए पाबंदी वाजिब है ,,लेकिन पटाखे फोड़ना सिर्फ एक दिन पटाखे फोड़ना रोकने की बात हो तो गैरवाजिब सी लगती है ,पटाखों से महामारी फैलाने वाले सक्रमण वाइरस की मोत होती है ,,व्यक्ति बीमारियों से बचता है ,,लेकिन गलत पैरवी ,,गलत आंकड़ों के करना सरकार की नाकामी से ऐसे आदेश होने पर भी सरकार की चुप्पी त्योहारों और आस्थाओ पर हमला है ,,,फिर कुछ लोग है जो ऐसे मामलो में भड़क कर एक दूसरे की धार्मिक आस्थाओ और त्योहारों के तोर तरीक़ो पर आवाज़ उठाकर पाबंदियों की मांग करके ,,सरकार की नाकामियों को छुपाने के लिए ,,आम लोगो को अखबारों ,सोशल मीडिया ,,चौपाल माउथ पब्लिसिटी के ज़रिये मुद्दों से भटकाने की कोशिश करते है ,आप किसके साथ है ,देश में क़ानून ,,देश में संविधान ,,धार्मिक आज़ादी का है ,और इस त्योहारों की आज़ादी ,,जश्न ,,खुशियों के तोर तरीक़ो को कोई अदालत ,,कोई क़ानून ,,कोई पाबंदी रोक नहीं सकती ,वोह बात अलग है हम लोग खुद साक्षर हो अच्छा बुरा पहचाने ,स्वेच्छिक रूप से खुद अपने ऊपर पाबंदी लगाये ,,लेकिन सरकार को ऐसे मामले में कमज़ोर पैरवी कर आदेश कराने और फिर इन आदेशों की आड़ में लोगो की धार्मिक आज़ादी को छीनने का हक़ हरगिज़ हरगिज़ नहीं दिया जा सकता ,,,,अख्तर खान अकेला कोटा राजस्थान

क़ुरान का सन्देश

और उन लोगों ने खु़दा को छोड़कर दूसरे-दूसरे माबूद बना रखे हैं ताकि वह उनकी इज़्ज़त के बाएस हों हरगि़ज़ नहीं (81)  (बल्कि) वह माबूद खु़द उनकी इबादत से इन्कार करेंगे और (उल्टे) उनके दुशमन हो जाएँगे (82)
(ऐ रसूल) क्या तुमने इसी बात को नहीं देखा कि हमने शैतान को काफि़रों पर छोड़ रखा है कि वह उन्हें बहकाते रहते हैं (83)
तो (ऐ रसूल) तुम उन काफिरों पर (नुज़ूले अज़ाब की) जल्दी न करो हम तो बस उनके लिए (अज़ाब) का दिन गिन रहे हैं (84)
कि जिस दिन परहेज़गारों केा (खु़दाए) रहमान के (अपने) सामने मेहमानों की तरह तरह जमा करेंगे (85)
और गुनेहगारों को जहन्नुम की तरफ प्यासे (जानवरो की तरह हकाँएगे (86)
(उस दिन) ये लोग सिफारिश पर भी क़ादिर न होंगे मगर (वहाँ) जिस शख़्स ने ख़ु़दा से (सिफारिश का) एक़रा ले लिया हो (87)
और (यहूदी) लोग कहते हैं कि खु़दा ने (अज़ीज़ को) बेटा बना लिया है (88)
(ऐ रसूल) तुम कह दो कि तुमने इतनी बड़ी सख़्त बात अपनी तरफ से गढ़ के की है (89)
कि क़रीब है कि आसमान उससे फट पड़े और ज़मीन शिगाफता हो जाए और पहाड़ टुकड़े-टुकडे़ होकर गिर पड़े (90)

11 अक्तूबर 2017

क़ुरान का सन्देश

और तुममे से कोई ऐसा नहीं जो जहन्नुम पर से होकर न गुज़रे (क्योंकि पुल सिरात उसी पर है) ये तुम्हारे परवरदिगार पर हेतेमी और लाज़मी (वायदा) है (71)
फिर हम परहेज़गारों को बचाएँगे और नाफ़रमानों को घुटने के भल उसमें छोड़ देंगे (72)
और जब हमारी वाज़ेए रौशन आयतें उनके सामने पढ़ी जाती हैं तो जिन लोगों ने कुफ्ऱ किया ईमानवालों से पूछते हैं भला ये तो बताओ कि हम तुम दोनों फरीक़ो में से मरतबे में कौन ज़्यादा बेहतर है और किसकी महफिल ज़्यादा अच्छी है (73)
हालाँकि हमने उनसे पहले बहुत सी जमाअतों को हलाक कर छोड़ा जो उनसे साज़ो सामान और ज़ाहिरी नमूद में कहीं बढ़ चढ़ के थी (74)
(ऐ रसूल) कह दो कि जो शख़्स गुमराही में पड़ा है तो खु़दा उसको ढ़ील ही देता चला जाता है यहाँ तक कि उस चीज़ को (अपनी आँखों से) देख लेंगे जिनका उनसे वायदा किया गया है या अज़ाब या क़यामत तो उस वक़्त उन्हें मालूम हो जाएगा कि मरतबे में कौन बदतर है और लश्कर (जत्थे) में कौन कमज़ोर है (बेकस) है (75)
और जो लोग राहे रास्त पर हैं खु़दा उनकी हिदायत और ज़्यादा करता जाता है और बाक़ी रह जाने वाली नेकियाँ तुम्हारे परवरदिगार के नज़दीक सवाब की राह से भी बेहतर है और अन्जाम के ऐतबार से (भी) बेहतर है (76)
(ऐ रसूल) क्या तुमने उस शख़्स पर भी नज़र की जिसने हमारी आयतों से इन्कार किया और कहने लगा कि (अगर क़यामत हुई तो भी) मुझे माल और औलाद ज़रूर मिलेगी (77)
क्या उसे ग़ैब का हाल मालूम हो गया है या उसने खु़दा से कोई अहद (व पैमान) ले रखा है हरगि़ज नहीं (78)
जो कुछ ये बकता है (सब) हम सभी से लिखे लेते हैं और उसके लिए और ज़्यादा अज़ाब बढ़ाते हैं (79)
और वो माल व औलाद की निस्बत बक रहा है हम ही उसके मालिक हो बैठेंगे और ये हमारे पास तनहा आयेगा (80)
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